फूलों से लदें सौन्दर्य एवं छाया का संगम गुलमोहर


गुलमोहर अपने लालीमा लिये पुष्पों तथा छाया के कारण राहगीरों तथा आम जनों को बरवस की अपनी ओर आकर्षित करती  है। गुलमोहर के पुष्प मुख्तः लाल रंगो में होती है। इसके अलावा यह लाल तथा केसरिया मिक्स, सफेद तथा लाल मिक्स आदि रंगों में उपलब्ध होती है। गुलमोहर के पुष्प् को ‘‘पी काक फ्लावर ट्री‘‘ भी कहते है। क्योंकि इसका पुष्प नाचते हुए मोर की तरह प्रतित होती है। इसके अलावा इसे ‘‘दी फायर ट्री भी कहते है। क्योंकि यह पुरे गुलमोहर के वृक्ष को अपनी लाल पुष्पों के ढक लेती है और लगता है मानो वृक्ष दहकते अंगारों का गोला हो।इसे बंगाली में ‘‘ रायल गोल्ड मोहर‘‘ तथा हिन्दी में ‘‘अषर्फियों वाला वृक्ष कहते हैं।

 गुलमोहर के पुष्प अप्रेल से जून तक खिलती है और गर्मियों में एक सुकुन भरा अहसास दिलाती है। गुलमोहर का पौधा पुष्पन तक तैयार होने मे लगभग 5 से 6 वर्ष का समय लगता है।गुलमोहर मुख्यतः उष्ण कटिबंधीय पौधा है जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों मे आसानी से लगाया जा सकता है। इसको अधिक शीतल में नही लगाया जा सकता है इसलिए ये शीत कालीन ऋतु में ज्यादा देखभाल मांगती है।

 मार्च पंहुचते -पहुचते गुलमोहर अपनी पत्तियों झाड़ना शुरू कर देती है। और पतझड़ के बाद नई पत्तियों तथा फूलों से यह वृक्ष लद जाती है। गुलमोहर के पत्तियों तथा टहनियों को एकत्रित कर हम इसका उपयोग कंपोस्ट खाद के रूप में अन्य पौधों मे कर सकते हैं इसके अलावा इस वृक्ष की लकड़ी का उपयोग हम घर में सजावटी सामान बनाने जैसे कैबिनेट, दराज इत्यादि में कर सकतें हैं।


                ((खास बाते)
1.फूलो से लद यह वृक्ष धहकते आग की तरह प्रतीत होता है इसलिए इसे ‘‘दी फायद ट्री या फ्लेम बायंट‘‘ भी कहते है।
2.यह पेड़ पतझड़ मे ठण्ड के बाद अपनी पत्तियों गिरा देता है।
3. गुलमोहर का प्रसारण बीज के द्वारा किया जाता है।
4.गुलमोहर के वृक्ष को हम छाया प्राप्त करने के लिए रास्ते के किनारे भी लगा सकते हैं
5. गुलमोहर को लान के बीचों बीज या किनारे मे भी बहुत आर्कषिक तरीके से सौन्दर्यीकरण के लिए उपयोग कर सकते हैं।

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