“ फागुन का रंग टेंशु का फुल ’’. . .( Butea)

                                       
बसंत की बिदाई और पतझड़ की स्वागत फाल्गुन का महिना और टेंशु के फुल से होली रंग, क्या कहने ? टेंशु की वृक्ष जिसकी ऊँचाई ज्यादा नहीं होती, यह बहुत ही सुदर भारतीय वृक्ष है, जो फूलने के बाद पूरा पेड़ ही लाल फूलों से ढक जाता है, इसलिए जिस जंगल में इसकी अधिकता  होती है, वह पूरा का पूरा जंगल लाल रंगों से ढक जाती है. टेंशु के वृक्ष को “ जंगल की आग ’’ भी कहा जाता है !


वैसे तो इसके कई नाम अलग – अलग जगह प्रचलित है, जैसे प्लाश, पलास,परसा,ढाक, केसू आदि, इसे इंग्लिश में Butea , तथा इसका वैज्ञानिक नाम Butea Monosperma (ब्यूटिया मोनोस्पर्मा ) के नाम से जाना जाता है !


उसे हम गार्डन में बाढ़ के किनारे लगा सकते हैं, पलाश क अनेक धार्मिक मान्यताओं तथा औषधिय के रूप में भी उपयोग किया जाता है, इसके पुष्प से हम प्राकृतिक रंग प्राप्त करते हैं, जिसे कई जगहों पर उपयोग किया जाता है !

पलाश के वृक्ष पुरे भारतवर्ष में पायी जाती है, ऊँचाई  वाले स्थान से नीचे मैदानी भागों तक, प्लाश  के पुष्प का श्वेत व पीले पुष्प भी होता है, जो काफी दुर्लभ है, और कहीं – कहीं ही इसका वृक्ष हमें दिखाई देता है !


प्लाश के पत्ता गोल और सख्त होती है, जिसे उपयोग भारत में कई तरह से किया जाता है ! खास कर दोना पत्तल बनाने ,हिन्दू धर्म में इसका उपयोग मृत आत्मा की शांति के लिए तर्पण आदि कामों में किया जाता है .इसके पुष्प से हमे प्राकृतिक रंग प्राप्त होते है ,जिसका उपयोग हम होली में करते हैं ,इन रंगों से आयुर्वेद में अनेक औषधि का निर्माण किया जाता है .

इसके फल पतले और चपटे होते है . जो तेज हवाओं में इसके प्रसारण का काम करती है .


पलाश के वृक्ष अपने गार्डन के लिए एक अच्छी शोभाकारी और उपयोगी वृक्ष है .

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